Wednesday, April 9, 2014

मेरा जीवन पार्ट-2

एक सहानुभूति सी जुड़ गयी थी सोच रहा था भगवान सबको एक जेसा क्यों नही बनता केंटिन पहुचने के बाद मेने सबसे परिचय करने की सोची में उस विकलांग लड़के के पास गया और हाथ आगे किया उसने तुरंत अपना हाथ आगे किया और बोला में इश्वर जांगिड और तुम मेने कहा वेसे सभी लोग मुझे तरुण मुखी नाम से जानते है बस उस पल हम एक दुसरे के दोस्त बन गए  बस फिर क्या था मस्ती केंटिन में हमारी कॉलेज के दिन काटने लगे में शादी शुदा था लेकिन मेरी कक्षा में दो चार गोरी और खुबसुरत लडकिया थी इसलिए मेने शादी की बात किसी को बताना उचित नही समझा बस किसी गोरी लड़की की हाँ का इंतजार करने लगा इन दिनों में भी नया शहर आया था रहने का कोइ अपना ठिकाना नही था इसलिए अपने ससुराल में रहने लगा लेकिन मेरी कोलेज के एक प्रोफेसर साहब मेरे ससुराल के बगल में रहते थे में भी अपने रंग में आ गया था रोज नया कारनामा करता था कभी हड़ताल कभी झगड़ा कभी सुलह इस तरह कॉलेज की भीड़ में मेने अपनी जगह बना दी थी सब लोग मुझे मुखी नाम से जानने लगे थे जिल्ले का पहला तकनिकी महाविधालय था इसलिए कई छात्र राजनीती के सन्गठन आये दिन सम्पर्क करके जुड़ने का कहते अखिल भारतीय विधार्थी परिषद ने मुझे सक्रिय राजनीती में आने का अवसर दिया परिषद ने मुझे मेरी महाविधालय का प्रमुख बना दिया था इससे मेरे होसले सातवे आसमान पर थे बस रोज कोई न कोइ बहाना खोजने लगा ताकि कॉलेज प्रशासन को तंग किया जाये न चाहते हुए भी मेने एक दुश्मनी मोल ले ली थी कॉलेज प्रशासन के गलत व्यवहार से कई छात्र परेशान थे इस कारण कई लोग मेरी बातो का समर्थन करने लगे यहाँ तक की कोलेज के कई प्रोफेसर भी पूरा समर्थन कर रहे थे ये बात कॉलेज प्रशन को अखर रही थी
जारी है.........

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